Category: Hindi Poetry

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रिश्तों का अलाव

कभी ज़िन्दगी से रूबरू हो कर देखा हैं ? कभी रिश्तों का अलाव तापा हैं ? सर्द सियाह रात की तपिश से जलते हुए कभी चोटी पे बैठे उस सन्यासी को महसूस किया हैं...

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नभ के आलिंगन में

नभ के आलिंगन में विविधताओं का ये देश बड़ा, सुमधुर संगम धर्मों का भाषाओँ में है स्नेह छुपा, शीश ललाट है हिम शोभित वरुणेश्वर हर पल पग धोता, इस सुन्दर पट पर जाने क्यूँ...

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ह्रदय विहान

अबाध गति से बहता पानी कहता…… जग तू अस्थिर……मैं ही शाश्वत तू रहता…….हर पल बदलता तेरी काया….तेरी छाया बदलती रहती….हर दिन हर पल मैं अविराम चलाचल प्राणी तंत्री प्राण समाहित जल में जो मैं...

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धन का दंश

कितना है श्रृंगार जनम में उदगार फिर क्यूँ है मन में, धन लालायित मनुष्यता का अंतिम जब आधार मरण में, दिशा विहीन मनुष्यता जब पशुता संग ही ओझल हो गयी, सिक्को की झंकार न...

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ईश्वर का रूप

सुबह सुबह की कोमल किरणे जब नदियों को छु जाती है, इठलाती बलखाती लहरें झिलमिल सी झांकी लाती है, नत मस्तक हो हिम-पर्बत भी उसको शीश नवाता है, कल-कल ध्वनि का सुमधुर गायन पल-पल...