युवाओं में बढ़ता अपराध

आज हम बात करना चाहेंगे आपराधिक कारनामों में लिप्त होते जा रहे युवाओं की और इन अपराधों के प्रति संवेदनहीन होते समाज की।
एक समय था जब सिर्फ क्रिमिनल बैकग्राउंड वाले और आदतन अपराधी किस्म के लोग ही अपराध करते देखे जाते थे।आज हमारा समाज पहले की अपेक्षा अधिक शिक्षित और सभ्य माना जाने लगा है किंतु आज के इस तथाकथित सभ्य समाज मे पढ़े लिखे और सम्भ्रांत परिवार के युवक भी आपराधिक प्रवृत्ति के बनते जा रहे हैं जो गंभीर चिंता का विषय है।हम ऐसा नही कह सकते कि सिर्फ अशिक्षा,अज्ञानता,गरीबी या किसी मजबूरी के कारण ही बच्चे अपराधी बन रहे है बल्कि नशे की लत अथवा झूठी शानोशौकत की वाहवाही लूटने के चक्कर में भी युवा वर्ग अपराधी बन रहे है।

increasing crime into teenager
(increasing crime into teenager) युवाओं में बढ़ता अपराध


हम बात करते है नैतिकता के पतन की, दूषित आचरण की,व्यक्तित्व के गिरते स्तर की,मृत होते जा रही संववेदनाओ कि,लुप्त होती जा रही मूल्यों की और आधुनिकता की आड़ में संस्कार हीन होते जा रहे युवाओं की।हम बात करते है स्वार्थी और संवेदनशून्य होते जा रहे युवाओं की जिनका दूसरों के दुख दर्द से कोई भावनात्मक संबंध नही होता।
आज के इस तथाकथित सभ्य समाज में आपराधिक घटनाओं में बेतहाशा वृद्धि हुई है।समाज के लगभग हर वर्ग के लोग लूट पाट, हत्या,बलात्कार जैसी घटनाओं की आशंका से सदैव सशंकित और भयभीत रहते है।अगर इस अपराध के कारणों पर गौर करे तो हर व्यक्ति व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी से बचते हुए दूसरों पर ही इसकी जिम्मेदारी डालता हुआ नजर आता है।परिवार का एक सदस्य दूसरे सदस्य के ऊपर इसकी जिम्मेदारी डाले अथवा जनता सरकार के ऊपर इसका दोष मढ़े किन्तु सच्चाई तो यह है कि कोई व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी से बच नही सकता।प्रत्येक को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी।एक स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए, अपने बच्चों के सुनहरे भविष्य के लिए।


अगर किसी परिवार का कोई बच्चा अपराधी बन जाता है यो इसके लिए माता पिता एक दूसरे पर दोषारोपण करते पाए जाते है अथवा उसकी संगति को ही कोसते है।कुछ लोग इसका कारण बेरोजगारी मानते हुए सरकार पर ही दोष मढ़ते है।खुद की ज़िम्मेदारी कोई नही मानता।जब कि सच्चाई तो यह है कि अगर हर माता पिता अपने बच्चों के चरित्र पर , उनकी गतिविधियों पर शुरू से ही नज़र रखे तो ऐसी नौबत ही नही आएगी कि उनका बच्चा आपराधिक प्रवृत्ति का बन जाए और उन्हें पश्चाताप करना पड़े इसलिए हर माता पिता को इसकी शुरुआत अपने घर परिवार से ही करनी होगी।अपने बच्चों को अच्छी परवरिश दे कर ,अच्छे संस्कार दे कर,संवेदनशीलता,त्याग और समर्पण का बीज डालकर उनमे स्वस्थ व्यक्तित्व का निर्माण करने की आवश्यकता है।
इसलिए अगर हर माता पिता अपने बच्चों के आचरण के प्रति सदैव सचेत रहे तो हमारा पूरा समाज आदर्श बन सकता है।यह सोचकर ही अति प्रसन्नता होती है कि काश! ऐसा हो पाता तो कितना अच्छा होता।भय का वातावरण समाप्त हो जाता और हम खुली हवा में साँस ले पाते।

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